चंपारण की चंपा चंपारण से दूर होती चली गई, क्योंकि ये वोट बैंक नहीं है इसलिए ?

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चम्पारण दो शब्दो से मिलकर बना है “चम्पा” + “अरण्य” कई जोड़, घटाव, गुना, भाग करने के बाद चम्पारण नाम का उद्गम हुआ। सैकड़ों वर्ष पूर्व यहाँ अधिक मात्रा में चम्पा फुल पाए जाते थे इसलिए ये चम्पारण बना लेकिन अब शायद ही कहीं चंपारण की चम्पा दिखे। चम्पा के फूलों से बहुत ही आकर्षक सुंगंध आती है। जिसके लिए चम्पारण प्रसिद्ध हुआ करता था। लेकिन इस चंपा के नाम पर कभी राजनीति नहीं हुई, और नाम ही इसका जिक्र किसी राजनेता के जुबान पे आता है सिर्फ चंपारण सत्याग्रह और यहाँ के किसानों पर राजनीति क्यों होती है, क्या इसलिए क्योंकि वो वोट बैंक है और चंपा तो बस एक फूल है और कुछ नहीं।

खैर चम्पारण की उत्तरी सीमाएं नेपाल से लगती है। चम्पारण के साथ-साथ नेपाल के तराई क्षेत्र के किसानों के खेती करने का तरीका भी एक समान ही है। ग्रामीण इलाकों में सीमावर्ती इलाका आकर्षित करता है जहाँ भारत और नेपाल की सीमा का पता ही नहीं चलता है कहीं कही सिर्फ एक छोटी सी नदी का फासला है। लोग सुबह-सुबह टहलने के लिए भी नेपाल चले जाते है। अगर को बाहरी इन इलाको में आए तो उनके लिए भारत और नेपाल का पता ही नहीं चलेगा। भारत और नेपाल के सीमावर्ती इलाको में रहने वाले लोगो की भेष भूषा बोली,भाषा, एक समान ही है। सैकडों वर्षो से चम्पारण के साथ साथ सैकड़ो किलोमीटर में फैले भारत और नेपाल के बॉर्डर पर रहने वालो समुदाय में प्राकृतिक, भौगोली, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव रहा है। मिथिला राज्य का जनकपुर जो अभी नेपाल में है और अयोध्या का हज़ारो वर्ष पुराना इतिहास रहा है। नेपाल से आने वाली के नदियां चम्पारण की मिट्टी को उर्वरक बनाती है। सबसे खास बात ये है कि चम्पारण और नेपाल के सीमावर्ती इलाको के लोग बात करने के लिए एक दूसरे के नेटवर्क का इस्तेमाल करते है। नेपाल के लोग एयरटेल,बीएसएनएल और चम्पारण के लोग मेरो और एनसेल नेटवर्क का इस्तेमाल करते है। भारत नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र के लोगो के आपसी संबंध और रिश्ते-नाते होने के कारण सिम आसानी से मिल जाते है।

हिमालय की तराई में बसा पश्चिमी चम्पारण के वाल्मीकि नगर का वन्यक्षेत्र और नेपाल से आई नारायणी नदी भी एक आकर्षण का केंद्र है। चम्पारण की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ मानी जाता है इसलिए यहाँ के किसानों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि ही है। अंग्रेज भी यहाँ निल की खेती इसलिए ही करते थे क्योंकि यहाँ की भूमि उपजाऊ है। गांधी जी ने यहाँ आने से कई बार माना कर दिया था वो तो चम्पारण का नाम तक नहीं जानते थे। लेकिन राजकुमार शुक्ल की ज़िद्द ने गांधी जी को चम्पारण आने पर मजबूर कर दिया। इनके बाद बाद अंग्रेजी हुकुम विध्रोह की आंधी को रोक ना सकी, राजकुमार शुक्ल का दृण निश्चय, गांधी जी का साथ, और चम्परानवासियों के जुनून के आगे ब्रिटिश हुकुम को नतमस्तक होना ही पड़ा। चम्पारण सत्याग्रह के बाद यहाँ के किसानों को निल की खेती से छुटकारा मिला।

यहाँ पूर्वी चंपारण में एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है। दुनिया भर से बैद्ध धर्मावलंबि इस बौद्धकालीन स्तूप को देखने आते है। इसके साथ ही अरेराज में भगवान शिव का सुप्रसिद्ध मंदिर है जो सोमेश्वरनाथ के नाम से विख्यात है और सावन के महीने में लाखों की संख्या में लोग जल अर्पित करने के लिए आते है। अरेराज के साथ हरसिद्धि, छपवा कृषि के लिए प्रसिद्ध है विभिन्न प्रकार की सब्जियों के साथ यहाँ, आम, लीची की खेती खूब होती है। पूरी चंपारण का रक्सौल शहर भारत और नेपाल की अंतराष्ट्रीय सीमा पर बसा है। रक्सौल अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उतना विकसित नहीं है जितना होना चाहिए। नेपाल जाने वाले समान का लगभग 60 से 70 फीसदी हिस्सा रक्सौल से होकर ही जाता है। सन्न 1927 से रक्सौल से नेपाल के अमलेखगंज तक 48 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन की शुरुआत की गई थी जिसे 1965 में बंद कर दिया गया। इसके बाद 2005 में फिर नेपाल में रेलवे की शुरुआत हुई लेकिन सिर्फ रक्सौल से बीरगंज के सिरिसिया डिपो तक ही। इस रेलवे लाइन की लंबाई 6 से 7 किलोमीटर ही है जिसका इस्तेमाल सिर्फ मालवाहक कन्टेनर ले जाने के लिए ही होता है।

पश्चिमी चम्पारण का वाल्मीकिनगर माता सीता की शरणस्थली होने से भी चंपारण की भूमि अति पवित्र है। महर्षि वाल्मीकि ने इन्ही जंगली में रामायण की रचना की थी और लवकुश को वीरता का ज्ञान दिया था, और इसी जंगल में अश्वमेध यज्ञ के अश्व के लिए अयोध्या के राजकुमारों के साथ लवकुश का युद्ध हुआ था। वाल्मीकि नगर और यहाँ के जंगल बहुत ही रमणीय स्थान है। ऐसी भूमि जहाँ किसी का भी मन लग जाए। बिहार के पश्चिमी चंपारण और बाल्मीकिनगर सबसे उत्तरी भाग में नेपाल की सीमाओं से सटा हुआ है पश्चिमी चम्पराण के मुख्यालय बेतिया से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह एक छोटा कस्‍बा है जहां कम आबादी है और यह अधिकांशत: वन क्षेत्र के अंदर है। यह पार्क उत्तर में नेपाल के रॉयल चितवन नेशनल पार्क और पश्चिम में हिमालय पर्वत की गंडक नदी से घिरा हुआ है।

एक ओर नेपाल का त्रिवेणी गाँव तथा दूसरी ओर चंपारण का भैंसालोटन गाँव के बीच नेपाल की सीमा पर बाल्मिकीनगर से 5 किलोमीटर की दूरी पर त्रिवेणी संगम है। गंडक के साथ ही यहाँ पंचनद और सोनहा नदी का मिलन होता है। श्रीमदभागवत पुराण के अनुसार विष्णु के प्रिय भक्त ‘गज’ और ‘ग्राह’ की लड़ाई इसी स्थल से शुरु हुई थी जिसका अंत हाजीपुर के निकट कोनहारा घाट पर हुआ था। चंपारण में भैसालोटन के साथ नेपाल की सिमा पर बसी एक छोटी सी जगह भिखना ठोढ़ी भी अपने प्राकृतिक सुंदरता के लिए कुछ चर्चित है। ब्रिटिश काल में उस वक्त के इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम ने भी यहाँ की मनमोहक शांत प्राकृतिक सौंदर्य का दिलदार किया था। चम्पारण का नन्दनगढ़, चानाकिगढ़ और लौरिया का अशोक स्तम्भ भी आकर्षण का केंद्र है।

चम्पारण की ऐसी बहुत सी किस्से कहानिया है जो इतिहास के पन्नो में दबा हुई है। हमारी कोशिश है कि हम वास्विकता को आपके सामने लाए और अपनी इस सभ्यता को अपनी अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित करे।

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